नज़रिया

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Playing with words

मेरे अगाध प्रेम को तुमने
हमेशा बंधन ही माना
अपना अपना नज़रिया है।१।

पत्थर ही फेंका किये तुम
कभी डूब कर देखते
कितना गहरा दरिया है ।२।

सर्दी में रूह को सुकूं दे
जून की तपती दोपहर में
तू बेचैनी का ज़रिया है ।३।

दिखती है रौशनी तुम्हें
क्या जानो किस के लिए
पल पल जलता दिया है ।४।

लगता है लतीफा तुम्हें
अमित इस मज़ाक को
मैनें खुद ही जिया है ।५।

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 83

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